इस प्रसंग को हम समग्र मुमुक्षु समाज के लिये एक आदर्श पंचकल्याणक के रूप में प्रस्तुत कर सके हैं, इसके अनेक कारण भी हैं। उसमें से अमुक यहाँ प्रस्तुत हैं।
- इस अपूर्व पंचकल्याणक में मंच का सम्पूर्ण समय केवल आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान और पंचकल्याणक के प्रसंगों की ही चर्चा करने में व्यतीत हुआ। इस सम्पूर्ण प्रसंग में किसी भी राशि की घोषणा मंच से नहीं बोली गयी थी और जो आदर्शरूप था।
- श्री जयसेन अपरनाम वसुबिन्दु आचार्य द्वारा रचित ‘प्रतिष्ठा पाठ’, वह सर्वाधिक प्राचीन, आचार्य भगवन्त द्वारा रचित और आचार्य परम्परा से प्राप्त हुआ प्रतिष्ठा विधि का ग्रन्थ है, जिसके आधार से सुवर्णपुरी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में समस्त विधियाँ की गयीं थीं। इन विधियों को निहारकर अपनी परिणति स्वरूपमय हो रही हो, ऐसा अनुभव हुआ।
- पाण्डाल के अन्दर दोनों ओर ज्ञानियों के आध्यात्मिक सुवाक्य लिखे थे, वे निरन्तर ज्ञायकभाव की घोषणा कर रहे थे।
- ध्वजारोहण से लेकर अन्तिम शान्तियज्ञ के समस्त ही कार्यक्रम, पूजा, भक्ति, स्वाध्याय, तत्त्वचर्चा, प्रवचन भेदविज्ञान की पुष्टि करानेवाले थे।
- गर्भ से लेकर मोक्षकल्याणक तक की श्री आदिनाथ तीर्थंकर के जीवन की समस्त ही घटनायें बहुत सुन्दर रीति से प्रस्तुत की गयी थी, जिसमें एक-एक प्रसंग का अर्थ समझ में आये और जीव तत्त्वज्ञान की प्रेरणा प्राप्त करे।
- आदर्शमय जीवन जीनेवाले अपने तीर्थंकरों और ज्ञानियों के जीवन की प्रत्येक घटना अपने को कोई न कोई बोध प्रदान करती है।
- पूज्य गुरुदेवश्री के 14वीं गाथा के प्रवचन, माताजी की चर्चा और विद्वानों के स्वाध्याय भी बहुत प्रेरणादायक थे।
- नर से नारायण, पामर से प्रभु बनने का यह प्रसंग, यह महोत्सव हम सबको सम्यग्दर्शन और भेदज्ञान में आदर्श निमित्तरूप होगा।
- यह सम्पूर्ण पंचकल्याणक हम सभी के लिये आदर्श तब कहा जायेगा जब हम सभी प्रत्येक प्रसंगों द्वारा अपनी भेदज्ञान की परिणतिरूप से परिणमकर, ज्ञान-वैराग्य की पुष्टि करके संसार, शरीर, भोगों से विरक्त होकर, आत्मसन्मुख का पुरुषार्थ प्रारम्भ कर सम्यग्दर्शन की प्राप्ति करें और पूज्य गुरुदेवश्री द्वारा दिग्दर्शित तत्त्वज्ञान को आत्मसात् करें।