वीर संवत 2550, पौष सूद 9 से पौष वद 1, शुक्रवार, 19 जनवरी से शुक्रवार, 26 जनवरी, 2024
अध्यात्मतीर्थ है सुवर्णपुरी, जहां बरसे ज्ञान धनेरा...
वीर संवत 2550, पौष सूद 9 से पौष वद 1, शुक्रवार, 19 जनवरी से शुक्रवार, 26 जनवरी, 2024
अध्यात्मतीर्थ है सुवर्णपुरी, जहां बरसे ज्ञान धनेरा...
श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव (पंचकल्याणक प्रतिष्ठा) भव्य जीवों के कल्याण के लिये एक अनुपम, अद्वितीय और अपूर्व महोत्सव है। यह महोत्सव मोक्ष प्राप्ति के लिये कारणभूत ज्ञान और वैराग्यप्रधान विधि का प्रदर्शन और जिनधर्म प्रभावना का महोत्सव है।
अपने त्रिकाली शुद्ध भगवान आत्मा में अपनेरूप दृष्टि की स्थापना करना अर्थात् मैं स्वयं जिनेन्द्र भगवान समान हूँ, ऐसी दृष्टि में स्थापना करना, उसे वास्तव में अर्थात् कि निश्चय से प्रतिष्ठा कहा जाता है और पाषाण अथवा धातु की तदाकार प्रतिमा में परम पूज्य जिनेन्द्रदेव की स्थापना करना, उसे व्यवहार प्रतिष्ठा महोत्सव कहा जाता है।.
जिस प्रकार लौकिक जीवन में शरीर को स्वस्थ रखने के लिये उत्तम भोजन और आत्मा को स्वस्थ रखने के लिये उत्तम तत्त्व विचार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन को मोक्षमार्ग में संलग्न करने के लिए पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की आवश्यकता होती है। इस कलिकाल में वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु के अतिरिक्त अन्य कोई शरणभूत नहीं है। स्वाध्यायी जीवों को भी वीतराग मार्ग में दृढ़ रहने के लिये जिनमन्दिर, जिनप्रतिमा के दर्शन-पूजन करना परम आवश्यक है। इस कारण श्रीमज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आवश्यक है।
स्वयं आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर जन्म-मरण से रहित होनेवाले और अपने को भी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करनेवाले तीर्थंकर परमात्माओं के जीवन की ये पाँच विशेष घटनायें — गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष — इन्हें पंचकल्याणक कहा जाता है। यह घटनायें तो सामान्य केवली के जीवन में भी दृष्टिगोचर होती है, परन्तु तीर्थंकर परमात्मा के जीवन की ये घटनायें अन्य जीवों के लिये पुरुषार्थ-ज्ञान-वैराग्य का प्रेरक निमित्त बनती है। इसलिए इन्हें कल्याणक कहा जाता है।
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में विधिनायक श्री जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा के ऊपर इन पाँच कल्याणकों का मंत्रोच्चार विधि द्वारा आरोपण करके उस प्रतिमाजी को अरिहन्त अथवा सिद्ध भगवानरूप से प्रतिष्ठित किया जाता है। छह दिनों में गर्भकल्याणक पूर्व क्रिया, गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, तपकल्याणक या दीक्षाकल्याणक, केवलज्ञानकल्याणक और मोक्षकल्याणक — इन कल्याणकों के माध्यम से तीर्थंकर भगवान के अन्तिम भव की घटनाओं का प्रतिमाजी के ऊपर आरोपण किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत शान्ति जाप की संकल्प विधि से लेकर शान्ति यज्ञ तक अनेक विभिन्न मन्त्रोच्चार आदि की विधियों का समावेश किया जाता है। जिसमें मुख्य विधियों के रूप में अंकन्यास विधि, तिलकदान विधि, अधीवासना विधि, स्वस्त्ययन विधि, मुखोद्घाटन विधि, नेत्रोन्मीलन विधि, प्राणप्रतिष्ठा विधि, सूरीमंत्र विधि आदि जिनबिम्ब प्रतिष्ठा की मुख्य विधियाँ हैं।
इसके अतिरिक्त भी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के दौरान की जानेवाली विभिन्न विधियों का वर्णन अनेक पुस्तकों में किया गया है। परन्तु इन सर्व शास्त्रों में ‘श्री जयसेन अपरनाम वसुबिन्दु आचार्य द्वारा रचित प्रतिष्ठा पाठ’ यह सर्वाधिक प्राचीन और आचार्य भगवन्त द्वारा रचित प्रतिष्ठाविधि का ग्रन्थ है, जिसके आधार से सुवर्णपुरी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में सर्व विधियाँ की गयी थीं।
संसार, शरीर और भोगों से विरक्त जीवों को श्री जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एक सातिशय पुण्य के बंध का और यश की वृद्धि का कारण होता है तथा प्रतिष्ठित जिनेन्द्र भगवान के दर्शनार्थियों को निष्कलंक परम शान्त मुद्रा स्वरूप जिनबिम्ब के दर्शन मात्र से सर्व विघ्न का नाश और विषय-कषायों से मुक्त हुआ जाता है। यह महोत्सव जिनेन्द्र भगवान के वीतराग मार्ग की रक्षा का कारण बनता है और सादि-अनन्त काल तक सम्यग्दर्शन का निमित्त बनता है।
वीतराग देव-शास्त्र-गुरु, पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी तथा तद्भक्त पूज्य बहिनश्री चंपाबेन के प्रभावनायोग में हम जिनशासन की प्रभावना में सदैव संलग्न रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि उनके ही मंगल आशीष के फलस्वरूप, श्री पंचमेरु-नन्दीश्वर जिनालय की प्रतिष्ठा के 38 वर्ष बाद सोनगढ़ में नवनिर्मित संकुल में जम्बूद्वीप शाश्वत जिनायतन, ध्यानस्थ बाहुबली मुनीन्द्र, त्रिकालवर्ती जिनेन्द्र मण्डप तथा श्री सीमन्धरस्वामी जिनालय में चार बालयति भगवान की स्थापना का, श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।
इस आयोजन की सफलता के लिये ट्रस्ट अपने कार्यकर्ताओं का, समग्र स्टाफ का, सोनगढ़ ग्राम की पंचायत तथा समस्त ग्रामवासियों का और प्रोफेशनल एजेन्सियों का आभार मानता है। देश-विदेश से अनेक साधर्मी बंधुओं ने इस कार्यक्रम में भाग लेकर इसकी शोभा में अभिवृद्धि की है, तदर्थ ट्रस्ट उनका सहर्ष आभार व्यक्त करता है, और भावना भाता है कि जिनशासन के तत्त्वप्रभावनायोग में हम सब संलग्न रहकर निज कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ें। तो चलो, हम सब श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव विशेषांक द्वारा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की सुवर्ण यादों को पुन: स्मरण करें…
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एक ऐसा महामंगलकारी अवसर है, जो जीव को पामर से परमात्मा अथवा संसारी से सिद्ध बनने की प्रेरणा प्रदान करता है। वास्तव में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के दो प्रकार हैं—एक निश्चय पंचकल्याणक और दूसरा व्यवहार पंचकल्याणक। पाषाण अथवा धातु की प्रतिमा में जिनेन्द्र भगवान की स्थापना करना, उसे व्यवहार पंचकल्याणक कहते हैं। परन्तु वास्तव में तो अपने निज आत्मा में भगवान आत्मा की स्थापना करना, उसे निश्चय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव कहते हैं। मनुष्य जीवन के प्रत्येक अनुष्ठान का एकमात्र प्रयोजन हो तो वह अपने भगवान आत्मा का सच्चा निर्णय अर्थात् सम्यग्दर्शन, उसका सच्चा ज्ञान अर्थात् सम्यग्ज्ञान और उसमें सच्ची लीनता अर्थात् सम्यक्चारित्र, यह ही है। उसके साथ, व्यवहार जीवन में श्रावक के षट् आवश्यक का पालन करता है—देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान। इसलिए जिनेन्द्र भगवान के दर्शन-पूजन श्रावकों को सरलता से हो सके, इसलिए व्यवहार पंचकल्याणक किये जाते हैं।
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के दौरान जितने भी प्रसंग आयोजित किये जाते हैं, वे चारों ही अनुयोगों का प्रतीक है, जिसमें अन्त में तो वीतरागता ही झलकती है। जिस प्रकार तीर्थंकर भगवान के पाँच कल्याणक प्रथमानुयोग का प्रतीक है। मेरुपर्वत तथा समवसरण आदि का वर्णन, वह करणानुयोग का विषय है। मुनिराज की साधना-आराधना, आहारदान आदि प्रसंग, वे चरणानुयोग का विषय है तथा पंचकल्याणक के दौरान आत्म-उत्थान की जो भावना प्रत्येक प्रसंग द्वारा प्रस्तुत की जाती है, वह द्रव्यानुयोग का उत्कृष्ट निमित्त है। इन प्रत्येक प्रसंगों के माध्यम से, आनेवाले मुमुक्षुओं के हृदय में वीतरागता का सिंचन होता है। जो प्राथमिक भूमिकावाले जीव हैं, वे बाल तीर्थंकर की शान तथा केवली परमात्मा के पुण्य के उदय आदि देखकर वीतराग धर्म में जुडऩे के लिये प्रेरित होते हैं। और जो स्वाध्यायी तथा सम्यक्त्व-सन्मुख जीव हैं, वे वैराग्य पोषक प्रसंग—जैसे कि मुनिराज की दीक्षा तथा उनकी साधना, और वैराग्यपूर्ण पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन तथा माताजी की तत्त्वचर्चाओं के माध्यम से अपने तत्त्व निर्णय की छनावट करते हैं।
अधिक जानेआदर्श पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ-साथ इस प्रसंग को निम्न कारणों से एक अद्भुत पंचकल्याणक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
आदर्श पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ-साथ इस प्रसंग को निम्न कारणों से एक अद्भुत पंचकल्याणक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
भरतक्षेत्र के भव्य जीवों के लिये विदेहक्षेत्र से प्रयाण करके एक महापात्र आत्मा ने भारत के गुजरात राज्य के उमराला गाँव में वि. सं. 1946, वैशाख शुक्ल 2, रविवार (दिनांक 21-04-1890) के दिन जन्म लिया। उन सत्यशोधक, पूर्व के संस्कारी, वैरागी महात्मा के हस्तकमल में वि. सं. 1978 (ई.स. 1922) में श्री समयसार शास्त्र आया और उनके हर्ष का पार नहीं रहा। जिस सत् की शोध में वे थे, वह उन्हें प्राप्त हो गया। श्री समयसारजी में छलकते अमृत सरोवर को उग्र पुरुषार्थी महापुरुष ने अन्तरनयन से देखा और घूँट भर-भरके अमृत पिया। उनके आत्मानन्द का पार नहीं रहा। उनके अन्तर जीवन में परिवर्तन हुआ और सोनगढ़ में पदार्पण हुआ।.