वीर संवत 2550, पौष सूद 9 से पौष वद 1, शुक्रवार, 19 जनवरी से शुक्रवार, 26 जनवरी, 2024

अध्यात्मतीर्थ है सुवर्णपुरी, जहां बरसे ज्ञान धनेरा...

अविस्मरणीय प्रतिष्ठा

अविस्मरणीय प्रतिष्ठा

पंचकल्याणक

श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव (पंचकल्याणक प्रतिष्ठा) भव्य जीवों के कल्याण के लिये एक अनुपम, अद्वितीय और अपूर्व महोत्सव है। यह महोत्सव मोक्ष प्राप्ति के लिये कारणभूत ज्ञान और वैराग्यप्रधान विधि का प्रदर्शन और जिनधर्म प्रभावना का महोत्सव है।

अपने त्रिकाली शुद्ध भगवान आत्मा में अपनेरूप दृष्टि की स्थापना करना अर्थात् मैं स्वयं जिनेन्द्र भगवान समान हूँ, ऐसी दृष्टि में स्थापना करना, उसे वास्तव में अर्थात् कि निश्चय से प्रतिष्ठा कहा जाता है और पाषाण अथवा धातु की तदाकार प्रतिमा में परम पूज्य जिनेन्द्रदेव की स्थापना करना, उसे व्यवहार प्रतिष्ठा महोत्सव कहा जाता है।.

जिस प्रकार लौकिक जीवन में शरीर को स्वस्थ रखने के लिये उत्तम भोजन और आत्मा को स्वस्थ रखने के लिये उत्तम तत्त्व विचार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन को मोक्षमार्ग में संलग्न करने के लिए पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की आवश्यकता होती है। इस कलिकाल में वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु के अतिरिक्त अन्य कोई शरणभूत नहीं है। स्वाध्यायी जीवों को भी वीतराग मार्ग में दृढ़ रहने के लिये जिनमन्दिर, जिनप्रतिमा के दर्शन-पूजन करना परम आवश्यक है। इस कारण श्रीमज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आवश्यक है।

स्वयं आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर जन्म-मरण से रहित होनेवाले और अपने को भी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करनेवाले तीर्थंकर परमात्माओं के जीवन की ये पाँच विशेष घटनायें — गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष — इन्हें पंचकल्याणक कहा जाता है। यह घटनायें तो सामान्य केवली के जीवन में भी दृष्टिगोचर होती है, परन्तु तीर्थंकर परमात्मा के जीवन की ये घटनायें अन्य जीवों के लिये पुरुषार्थ-ज्ञान-वैराग्य का प्रेरक निमित्त बनती है। इसलिए इन्हें कल्याणक कहा जाता है।

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में विधिनायक श्री जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा के ऊपर इन पाँच कल्याणकों का मंत्रोच्चार विधि द्वारा आरोपण करके उस प्रतिमाजी को अरिहन्त अथवा सिद्ध भगवानरूप से प्रतिष्ठित किया जाता है। छह दिनों में गर्भकल्याणक पूर्व क्रिया, गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, तपकल्याणक या दीक्षाकल्याणक, केवलज्ञानकल्याणक और मोक्षकल्याणक — इन कल्याणकों के माध्यम से तीर्थंकर भगवान के अन्तिम भव की घटनाओं का प्रतिमाजी के ऊपर आरोपण किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत शान्ति जाप की संकल्प विधि से लेकर शान्ति यज्ञ तक अनेक विभिन्न मन्त्रोच्चार आदि की विधियों का समावेश किया जाता है। जिसमें मुख्य विधियों के रूप में अंकन्यास विधि, तिलकदान विधि, अधीवासना विधि, स्वस्त्ययन विधि, मुखोद्घाटन विधि, नेत्रोन्मीलन विधि, प्राणप्रतिष्ठा विधि, सूरीमंत्र विधि आदि जिनबिम्ब प्रतिष्ठा की मुख्य विधियाँ हैं।

इसके अतिरिक्त भी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के दौरान की जानेवाली विभिन्न विधियों का वर्णन अनेक पुस्तकों में किया गया है। परन्तु इन सर्व शास्त्रों में ‘श्री जयसेन अपरनाम वसुबिन्दु आचार्य द्वारा रचित प्रतिष्ठा पाठ’ यह सर्वाधिक प्राचीन और आचार्य भगवन्त द्वारा रचित प्रतिष्ठाविधि का ग्रन्थ है, जिसके आधार से सुवर्णपुरी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में सर्व विधियाँ की गयी थीं।

संसार, शरीर और भोगों से विरक्त जीवों को श्री जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एक सातिशय पुण्य के बंध का और यश की वृद्धि का कारण होता है तथा प्रतिष्ठित जिनेन्द्र भगवान के दर्शनार्थियों को निष्कलंक परम शान्त मुद्रा स्वरूप जिनबिम्ब के दर्शन मात्र से सर्व विघ्न का नाश और विषय-कषायों से मुक्त हुआ जाता है। यह महोत्सव जिनेन्द्र भगवान के वीतराग मार्ग की रक्षा का कारण बनता है और सादि-अनन्त काल तक सम्यग्दर्शन का निमित्त बनता है।

ट्रस्टी मंडल की भावना

वीतराग देव-शास्त्र-गुरु, पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी तथा तद्भक्त पूज्य बहिनश्री चंपाबेन के प्रभावनायोग में हम जिनशासन की प्रभावना में सदैव संलग्न रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि उनके ही मंगल आशीष के फलस्वरूप, श्री पंचमेरु-नन्दीश्वर जिनालय की प्रतिष्ठा के 38 वर्ष बाद सोनगढ़ में नवनिर्मित संकुल में जम्बूद्वीप शाश्वत जिनायतन, ध्यानस्थ बाहुबली मुनीन्द्र, त्रिकालवर्ती जिनेन्द्र मण्डप तथा श्री सीमन्धरस्वामी जिनालय में चार बालयति भगवान की स्थापना का, श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।

इस आयोजन की सफलता के लिये ट्रस्ट अपने कार्यकर्ताओं का, समग्र स्टाफ का, सोनगढ़ ग्राम की पंचायत तथा समस्त ग्रामवासियों का और प्रोफेशनल एजेन्सियों का आभार मानता है। देश-विदेश से अनेक साधर्मी बंधुओं ने इस कार्यक्रम में भाग लेकर इसकी शोभा में अभिवृद्धि की है, तदर्थ ट्रस्ट उनका सहर्ष आभार व्यक्त करता है, और भावना भाता है कि जिनशासन के तत्त्वप्रभावनायोग में हम सब संलग्न रहकर निज कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ें। तो चलो, हम सब श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव विशेषांक द्वारा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की सुवर्ण यादों को पुन: स्मरण करें…

प्रमुख श्री, सेक्रेटरी और समस्त ट्रस्टीगण
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की भावना- आत्मभावना / आत्मधर्म

प्रतिष्ठाचार्य

  • पं. सुभाषभाई सेठ

सह – प्रतिष्ठाचार्य

  • ब्र. पं. हेमन्तभाई गांधी

सहयोगी प्रतिष्ठाचार्य

  • पं. अतुलभाई कामदार
  • पं. नितिनभाई सेठ
  • पं. शैलेशभाई गांधी
  • पं. प्रमोदभाई जैन
  • श्री अतुलभाई गांधी
  • श्री निखिलभाई मेहता
  • श्री सोमिलभाई मेहता

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव एक ऐसा महामंगलकारी अवसर है, जो जीव को पामर से परमात्मा अथवा संसारी से सिद्ध बनने की प्रेरणा प्रदान करता है। वास्तव में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के दो प्रकार हैं—एक निश्चय पंचकल्याणक और दूसरा व्यवहार पंचकल्याणक। पाषाण अथवा धातु की प्रतिमा में जिनेन्द्र भगवान की स्थापना करना, उसे व्यवहार पंचकल्याणक कहते हैं। परन्तु वास्तव में तो अपने निज आत्मा में भगवान आत्मा की स्थापना करना, उसे निश्चय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव कहते हैं। मनुष्य जीवन के प्रत्येक अनुष्ठान का एकमात्र प्रयोजन हो तो वह अपने भगवान आत्मा का सच्चा निर्णय अर्थात् सम्यग्दर्शन, उसका सच्चा ज्ञान अर्थात् सम्यग्ज्ञान और उसमें सच्ची लीनता अर्थात् सम्यक्चारित्र, यह ही है। उसके साथ, व्यवहार जीवन में श्रावक के षट् आवश्यक का पालन करता है—देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान। इसलिए जिनेन्द्र भगवान के दर्शन-पूजन श्रावकों को सरलता से हो सके, इसलिए व्यवहार पंचकल्याणक किये जाते हैं।

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के दौरान जितने भी प्रसंग आयोजित किये जाते हैं, वे चारों ही अनुयोगों का प्रतीक है, जिसमें अन्त में तो वीतरागता ही झलकती है। जिस प्रकार तीर्थंकर भगवान के पाँच कल्याणक प्रथमानुयोग का प्रतीक है। मेरुपर्वत तथा समवसरण आदि का वर्णन, वह करणानुयोग का विषय है। मुनिराज की साधना-आराधना, आहारदान आदि प्रसंग, वे चरणानुयोग का विषय है तथा पंचकल्याणक के दौरान आत्म-उत्थान की जो भावना प्रत्येक प्रसंग द्वारा प्रस्तुत की जाती है, वह द्रव्यानुयोग का उत्कृष्ट निमित्त है। इन प्रत्येक प्रसंगों के माध्यम से, आनेवाले मुमुक्षुओं के हृदय में वीतरागता का सिंचन होता है। जो प्राथमिक भूमिकावाले जीव हैं, वे बाल तीर्थंकर की शान तथा केवली परमात्मा के पुण्य के उदय आदि देखकर वीतराग धर्म में जुडऩे के लिये प्रेरित होते हैं। और जो स्वाध्यायी तथा सम्यक्त्व-सन्मुख जीव हैं, वे वैराग्य पोषक प्रसंग—जैसे कि मुनिराज की दीक्षा तथा उनकी साधना, और वैराग्यपूर्ण पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन तथा माताजी की तत्त्वचर्चाओं के माध्यम से अपने तत्त्व निर्णय की छनावट करते हैं।

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Panchkalyan Pratistha

अद्भुत पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव

आदर्श पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ-साथ इस प्रसंग को निम्न कारणों से एक अद्भुत पंचकल्याणक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

આ અપૂર્વ પંચકલ્યાણકમાં મંચનો સઘળો સમય કેવળ આધ્યાત્મિક તત્ત્વજ્ઞાન અને પંચકલ્યાણકના પ્રસંગોની જ ચર્ચા કરવામાં વ્યતીત થયો. આ સંપૂર્ણ પ્રસંગમાં કોઈપણ રકમની જાહેરાત કે બોલી બોલવામાં આવી ન હતી અને જે આદર્શરૂપ હતું.

શ્રી જયસેન અપરનામ વસુબિંદુ આચાર્ય દ્વારા રચિત “પ્રતિષ્ઠા પાઠ” એ સર્વથી પ્રાચીન, આચાર્ય ભગવંત દ્વારા રચાયેલો અને આચાર્ય પરંપરાથી પ્રાપ્ત થયેલો પ્રતિષ્ઠા વિધિનો ગ્રંથ છે, જેના આધારે સુવર્ણપુરી પંચકલ્યાણક પ્રતિષ્ઠા મહોત્સવમાં સર્વ વિધિઓ કરવામાં આવી હતી. આ વિધિઓને નિહાળીને આપણી પરિણતિ સ્વરૂપમય થઈ રહી હોય એવો અનુભવ થયો.

પંડાલની અંદર બંને બાજુ જ્ઞાનીઓના આધ્યાત્મિક સુવાક્યો લખ્યા હતા તે નિરંતર જ્ઞાયકભાવની ઘોષણા કરી રહ્યા હતા.

ધ્વજારોહણથી લઈને અંતિમ શાંતિયજ્ઞના બધા જ કાર્યક્રમ, પૂજા, ભક્તિ, સ્વાધ્યાય, તત્ત્વચર્ચા, પ્રવચન ભેદવિજ્ઞાનની પુષ્ટિ કરાવવાવાળા હતા.

ગર્ભથી લઈને મોક્ષકલ્યાણક સુધીની શ્રી આદિનાથ તીર્થંકરના જીવનની બધી જ ઘટનાઓ ખૂબ સુંદર રીતે પ્રસ્તુત કરવામાં આવી હતી જેમાં એક-એક પ્રસંગનો અર્થ સમજાય અને જીવ તત્ત્વજ્ઞાનની પ્રેરણાને પ્રાપ્ત કરે.

આદર્શમય જીવન જીવવાવાળા આપણા તીર્થંકરો અને જ્ઞાનીઓના જીવનની દરેક ઘટના આપણને કોઈને કોઈ બોધ આપે છે.

પૂજ્ય ગુરુદેવશ્રીના ૧૪મી ગાથા પરના પ્રવચનો, માતાજીની ચર્ચા અને વિદ્વાનોના સ્વાધ્યાય પણ ખૂબ પ્રેરણાદાયક હતા.

નરથી નારાયણ, પામરથી પ્રભુ બનવાનો આ પ્રસંગ, આ મહોત્સવ આપણા બધાને સમ્યગ્દર્શન અને ભેદજ્ઞાનમાં આદર્શ નિમિત્તરૂપ થશે.

આ સંપૂર્ણ પંચકલ્યાણક આપણા સર્વ માટે આદર્શ ત્યારે કહેવાશે જ્યારે આપણે સર્વ એક-એક થયેલ પ્રસંગો દ્વારા આપણી ભેદજ્ઞાનની પરિણતિરૂપે પરિણમીને, જ્ઞાન-વૈરાગ્યની પુષ્ટી કરીને સંસાર, શરીર, ભોગોથી વિરક્ત થઈને, આત્મસન્મુખનો પુરુષાર્થ ઉપાડીને સમ્યગ્દર્શનની પ્રાપ્તિ કરીએ અને પૂજ્ય ગુરુદેવશ્રીએ બતાવેલ તત્ત્વજ્ઞાનને આત્મસાત કરીએ.

अद्भुत पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव

आदर्श पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ-साथ इस प्रसंग को निम्न कारणों से एक अद्भुत पंचकल्याणक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

  • प्रथम तो 41 फीट उन्नत बाहुबली मुनीन्द्र की प्रतिमा और उसके साथ सुन्दर जम्बूद्वीप की रचना के साथ प्रवचनमण्डप में विराजमान 3 भगवान और श्री सीमंधरस्वामी जिनमन्दिर में 4 बालयति भगवान सुवर्णपुरी की शोभा में विशिष्ट अभिवृद्धि कर रहे थे।
  • एक अद्भुत ‘श्री जम्बूद्वीप-बाहुबली जिनायतन प्रोजेक्ट चोरस फीट (स्क्वायर फीट) योजना’ भी ट्रस्ट द्वारा घोषित की गयी थी। इस योजना का अभिप्राय यह था कि सर्व साधर्मी संकुल के निर्माण में भाग ले सकें। इस योजना को बहुत अच्छा प्रतिसाद प्राप्त हुआ था। जिसके अन्तर्गत भाग लेनेवाले लाभार्थियों में से मैजिक व्हिल (Magic Wheel) द्वारा निर्धारित 10 परिवारों को 2 जिनप्रतिमाओं की प्रतिष्ठा करने का लाभ भी प्रदान किया गया था।
  • जिस स्थान पर यह पंचकल्याणक मनाया गया, वह स्थान अर्थात् जो अयोध्यानगरी बनायी गयी थी, वह सभी के मन को हर लेनेवाली थी। पाण्डाल के बाहर आशीर्वाद प्रदान करती अति विशाल पूज्य गुरुदेवश्री की प्रतिकृति अद्भुत रीति से शोभित हो रही थी।
  • माता के सोलह स्वप्न, उनका फल दर्शाता हुआ नृत्य, इन्द्रसभा, राज्यसभा की तत्त्वचर्चायें, बाल तीर्थंकर का जन्माभिषेक, पालनाझूलन का उत्साह, तपकल्याणक में वैराग्य के समस्त प्रसंग, आहारदान, समवसरण रचना और अन्तिम मोक्षकल्याणक का दृश्य समस्त प्रसंग अविस्मरणीयरूप से सम्पन्न हुए।
  • स्वाध्यायप्रेमी देव-देवी के रूप में 31 जोड़े बनाये गये थे। जो इन्द्र-इन्द्राणी के साथ स्वर्ग से पंचकल्याणक मनाने आते हैं और तीर्थंकर भगवान के कल्याणकों की पूजा तथा प्रतिष्ठा के विधानों में लाभ लेते हैं। इस योजना द्वारा स्वाध्याय को अद्भुत प्रोत्साहन प्रदान किया गया था।
  • संध्याकाल की बेला के सांस्कृतिक कार्यक्रम विशेष आकर्षण का केन्द्र बने रहे—‘सर्वगुणांश ते समकित’, ‘मैं सोनगढ़’, ‘अकृत्रिम चैत्यालयस्य वंदनम’, ‘आदिपुराण’, ‘ततक्षण योग्यता’ आदि कार्यक्रमों ने तो धूम मचाकर तत्त्वज्ञान की रेलमछेल कर दी थी।
  • भरत-बाहुबली और ब्राह्मी-सुन्दरी का संवाद हुआ जिसमें महाराज ऋषभदेव की वैराग्यमय परिणति दर्शाकर मुमुक्षु जीवों को भाव विभोर कर दिया।
  • इस प्रसंग की विशिष्टता यह थी कि अनेक दिगम्बर के अतिरिक्त जैन तथा अनेक जैनेतर जिज्ञासु भी पधारे थे। और महोत्सव का लाभ लेकर, सत्य तत्त्व सुनकर धन्य बन गये थे।

पूज्य गुरुदेवश्री का सोनगढ़ में पदार्पण, सत्य उद्घाटन, स्थायी निवास से श्री आदिनाथ दिगम्बर जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव पर्यंत की समयरेखा

भरतक्षेत्र के भव्य जीवों के लिये विदेहक्षेत्र से प्रयाण करके एक महापात्र आत्मा ने भारत के गुजरात राज्य के उमराला गाँव में वि. सं. 1946, वैशाख शुक्ल 2, रविवार (दिनांक 21-04-1890) के दिन जन्म लिया। उन सत्यशोधक, पूर्व के संस्कारी, वैरागी महात्मा के हस्तकमल में वि. सं. 1978 (ई.स. 1922) में श्री समयसार शास्त्र आया और उनके हर्ष का पार नहीं रहा। जिस सत् की शोध में वे थे, वह उन्हें प्राप्त हो गया। श्री समयसारजी में छलकते अमृत सरोवर को उग्र पुरुषार्थी महापुरुष ने अन्तरनयन से देखा और घूँट भर-भरके अमृत पिया। उनके आत्मानन्द का पार नहीं रहा। उनके अन्तर जीवन में परिवर्तन हुआ और सोनगढ़ में पदार्पण हुआ।.

वि. सं. 1991 (ई.स. 1935), चैत्र शुक्ल 13, महावीर जन्मकल्याणक के दिन ‘स्टार ऑफ इंडिया, सोनगढ़’ में श्री पार्श्वप्रभु के चित्रपट समक्ष परिवर्तन किया, सम्प्रदाय का त्याग करके स्वयं को दिगम्बर

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वि. सं. 1994 (ई.स. 1938)

वि. सं ૧૯૯૪ (ई.स. ૧૯૩૮)

. सं. 1994 (ई.स. 1938) में श्री स्वाध्यायमंदिर में स्थायी पधारे और श्री समयसार की स्थापना पूज्य बहिनश्री चंपाबेन के हस्त से हुई।

वि. सं. 1997 (ई.स. 1941) में श्री सीमंधर भगवान जिनमंदिर की प्रतिष्ठा हुई, तथा धार्मिक शिक्षणवर्ग की शुरुआत हुई।

वि. सं ૧૯૯૭ (ई.स. ૧૯૪૧)

वि. सं ૧૯૯૮ (ई.स. ૧૯૪૨)

वि. सं. 1998 (ई.स. 1942) में श्री सीमंधरस्वामी जिनेन्द्र धर्मसभा (समवसरण) की प्रतिष्ठा हुई।

वि. सं. 2000 (ई.स. 1944) में ‘आत्मधर्म’ मासिक का प्रकाशन शुरु हुआ।

वि. सं ૨૦૦૦ (ई.स. ૧૯૪૪)

वि. सं ૨૦૦૩ (ई.स. ૧૯૪૭)

वि. सं. 2003 (ई.स. 1947) में ‘भगवान श्री कुंदकुंद प्रवचनमंडप’ का उद्घाटन हुआ।

वि. सं. 2005 (ई.स. 1949) में ब्रह्मचारी बहिनों के स्थायी निवास के लिए ब्रह्मचर्याश्रम की स्थापना हुई।.

वि. सं ૨૦૦૫ (ई.स. ૧૯૪૯)

वि. सं ૨૦૦૬ (ई.स. ૧૯૫૦)

वि. सं ૨૦૦૬ (ई.स. ૧૯૫૦)में ‘सद्गुरु प्रवचनप्रसाद’ नामक दैनिक पत्रिका का प्रकाशन शुरु हुआ।

वि. सं ૨૦૦૮ (ई.स. ૧૯૫૨) में जैन विद्यार्थीगृह की स्थापना हुई।

वि. सं ૨૦૦૮ (ई.स. ૧૯૫૨)

वि. सं ૨૦૦૯ (ई.स. ૧૯૫૩)

वि. सं ૨૦૦૯ (ई.स. ૧૯૫૩) में 63’ उन्नत मानस्तम्भ, जिसमें ऊपर-नीचे चतुर्मुख श्री सीमंधरनाथ विराजते हैं, उनकी अति भक्तिभाव से प्रतिष्ठा हुई।

वि. सं ૨૦૧૩ (ई.स. ૧૯૫૭) में श्री सीमंधर भगवान जिनमंदिर का विस्तृतिकरण हुआ और उसके ऊपर के भाग में विराजमान श्री नेमिनाथ भगवान पुन: वेदीप्रतिष्ठा पूर्वक विराजमान हुए।

वि. सं ૨૦૧૩ (ई.स. ૧૯૫૭)

वि. सं ૨૦૩૦ (ई.स. ૧૯૭૪)

वि. सं ૨૦૩૦ (ई.स. ૧૯૭૪) में ‘श्री महावीर-कुंदकुंद दिगम्बर जैन परमागममंदिर’की प्रतिष्ठा 25000 मुमुक्षुओं की उपस्थिति में हुई।

वि. सं ૨૦૪૧ (ई.स. ૧૯૮૫) में श्री आदिनाथ आदि भगवंतों तथा ‘श्री दिगम्बर जैन पंचमेरु – नंदीश्वर जिनालय’में विराजमान शाश्वत् जिनवृंदों की पावन पधरामणी हुई।

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वि. सं ૨૦૪૧ (ई.स. ૧૯૮૫)

વિવિધ વર્ષો

जहाँ सौराष्ट्र प्रदेश में दिगम्बर जिनालय नाममात्र ही थे, वहाँ पूज्य गुरुदेवश्री के शुभ हस्त से शुद्ध तेरापंथी आम्नाय अनुसार दिगम्बर जिनालयों की 33 पंचकल्याणक प्रतिष्ठायें तथा 33 वेदी प्रतिष्ठायें हुईं।

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इसी श्रृंखला में इस सुवर्णपुरी में श्री बाहुबली मुनीन्द्र की खड्गासन प्रतिमा स्थापित करना और जम्बूद्वीप की रचना करना, जिससे यह क्षेत्र जैनों का महत्त्वपूर्ण तीर्थधाम बन सके, ऐसा निर्णय किया।

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वि. सं ૨૦૮૦ (ई.स. ૨૦૨૪)