वीर संवत 2550, पौष सूद 9 से पौष वद 1, शुक्रवार, 19 जनवरी से शुक्रवार, 26 जनवरी, 2024
अध्यात्मतीर्थ है सुवर्णपुरी, जहां बरसे ज्ञान धनेरा...
वीर संवत 2550, पौष सूद 9 से पौष वद 1, शुक्रवार, 19 जनवरी से शुक्रवार, 26 जनवरी, 2024
अध्यात्मतीर्थ है सुवर्णपुरी, जहां बरसे ज्ञान धनेरा...
मुमुक्षु चातक पक्षी की भाँति जिस जम्बूद्वीप शाश्वत जिनायतन और ध्यानस्थ बाहुबली मुनीन्द्र की प्रतिष्ठा की विगत दो दशकों से प्रतीक्षा कर रहे थे और अन्तिम कितने ही वर्षों से जिसकी जोरदार तैयारियाँ (नीचे देखिए) कर रहे थे, वह प्रसंग अब आ गया है।
पौष शुक्ल ૭, बुधवार, दिनांक . ૧૭-૦૧-૨૦૨૪के दिन मुमुक्षुओं का आनन्द अन्तर में समाता नहीं था क्योंकि आज तो प्रभु के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव की नांदीविधान आदि कलश घटपूरण विधि और ध्वजदण्ड शुद्धिविधि करनी थी। इस विधि में (1) नांदीविधान आदि 3 कलश, (2) जिनेन्द्र भगवान की वेदी पर विराजमान किये जानेवाले 134 कलश, (3) पंच परमेष्ठी विधान के 4 कलश तथा (4) यागमण्डल विधान के 4 कलशों की घटपूरण विधि प्रात:काल जिनेन्द्र अभिषेक, पूजन के पश्चात् प्रतिष्ठाचार्यजी के द्वारा सानन्द सम्पन्न हुई।
तत्पश्चात् पूज्य गुरुदेवश्री के प्रवचन के बाद नांदीविधान कलश लेकर बाजते-गाजते भक्ति करते हुए मुमुक्षु पूज्य बहिनश्री के निवासस्थान पर गये और पूज्य भगवती माता के चित्रपट के समक्ष कलश विराजमान किया। इस प्रसंग पर मुमुक्षु धन्यता अनुभव कर रहे थे और पूज्य गुरुदेवश्री तथा पूज्य भगवती माता की परोक्ष उपस्थिति का अनुभव कर रहे थे। इस आदर-सम्मान के बाद नांदीविधान कलश भगवान के माता-पिता के घर में विराजमान किया गया। इस प्रसंग का लाभ भगवान के माता-पिता, सौधर्म-शची आदि सर्व इन्द्र-इन्द्राणियों, अष्टकुमारी देवियों, ब्रह्मचारी बहिनों और देव-देवियों को प्रदान किया गया था। (अनुसंधान : आत्मधर्म अंक फरवरी, 2024)
पौष शुक्ल ૮, गुरुवार, दिनांक . ૧૮-૦૧-૨૪के दिन शान्तिजाप संकल्प, प्रतिष्ठा वेदी, मंडप तथा भूमिशुद्धि की विधि सम्पन्न हुई थी। समस्त जीव वीतराग-शान्ति को प्राप्त करें, इस भावना से प्रतिष्ठाचार्य शान्तिजाप के संकल्प लेते हैं। इस संकल्प की पूर्ति के लिये सर्व इन्द्र, राजा, देव तथा लगभग 80 भाईयों ने शान्तिजाप का संकल्प लिया। इस विधि के दौरान मन्त्र से प्रासुक किये हुए जल से प्रतिष्ठा की वेदी, मण्डप और भूमि की शुद्धि की गयी। अब प्रतिष्ठा मण्डप एक विशाल जिनमन्दिर के रूप से अयोध्या नगरी में शोभित हो रहा था।